Wednesday, September 23, 2026
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पश्चिम एशिया संघर्ष का भारत की अर्थव्यवस्था पर असर, रिपोर्ट में सामने आए कारण


पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का भारत की अर्थव्यवस्था पर कई तरह का प्रभाव पड़ सकता है। एसबीआई रिसर्च की एक नई रिपोर्ट के अनुसार बढ़ती भू-राजनीतिक तनाव की स्थिति में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, ऊर्जा आपूर्ति मार्गों में बाधा, व्यापार और खाड़ी देशों से आने वाले प्रेषण पर असर पड़ने की आशंका है।

अगर तनाव लंबा समय तक जारी रहा तो?

रिपोर्ट में कहा गया है कि फिलहाल महंगाई पर तत्काल असर सीमित रह सकता है, लेकिन अगर तनाव लंबे समय तक जारी रहता है और सप्लाई चेन बाधित होती है तो वैश्विक आर्थिक स्थिरता पर असर पड़ सकता है।

तेल आपूर्ति को लेकर क्या है संकट?

  • भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर है। भारत अपनी लगभग 90 प्रतिशत तेल जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है।
  • कुल 5.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन आयात में से करीब 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है।
  • अगर इस महत्वपूर्ण मार्ग पर यातायात बाधित होता है तो भारत के लिए आपूर्ति संकट और आयात लागत बढ़ने का जोखिम पैदा हो सकता है।
  • दरअसल, दुनिया के कुल कच्चे तेल का करीब 20 प्रतिशत इसी संकरे जलमार्ग से होकर गुजरता है, जिससे यह वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का एक अहम केंद्र बन जाता है।

वैश्विक बाजारों कैसे दिख रहा असर?

वैश्विक बाजारों में भी तनाव का असर दिखाई देने लगा है। ब्रेंट क्रूड की कीमत दिसंबर 2025 में करीब 58.92 डॉलर प्रति बैरल और फरवरी 2026 के अंत में 70.75 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर मार्च की शुरुआत में लगभग 85.40 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है और भू-राजनीतिक जोखिम बढ़ने के साथ यह 89 डॉलर प्रति बैरल के पार भी चली गई।

महंगाई को लेकर क्या है संभावना?

रिपोर्ट के अनुसार कच्चे तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से भारत का चालू खाता घाटा (CAD) करीब 36 बेसिस प्वाइंट तक बढ़ सकता है। साथ ही लागत आधारित महंगाई बढ़ने से उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) महंगाई दर में भी लगभग 35-40 बेसिस प्वाइंट तक इजाफा हो सकता है।

तेल की कीमतों में वृद्धि से क्या हो सकता है?

तेल कीमतों में लगातार वृद्धि आर्थिक वृद्धि को भी प्रभावित कर सकती है। अनुमान है कि हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से भारत की GDP वृद्धि दर में लगभग 20-25 बेसिस प्वाइंट की कमी आ सकती है। अगर कीमतें 130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती हैं तो वित्त वर्ष 2027 में भारत की GDP वृद्धि दर अनुमानित 7 प्रतिशत के बजाय करीब 6 प्रतिशत तक सीमित रह सकती है। रिपोर्ट में खाड़ी देशों से आने वाले प्रेषण (यानी भेजे जाने वाले पैसे) पर भी जोखिम जताया गया है। भारत को वित्त वर्ष 2025 में लगभग 138 अरब डॉलर का व्यक्तिगत प्रेषण प्राप्त हुआ, जो वित्त वर्ष 2024 के 119 अरब डॉलर से अधिक है। इनमें से करीब 38 प्रतिशत राशि खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) देशों से आती है, इसलिए क्षेत्र की आर्थिक स्थिति का इस पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है।

पश्चिम एशिया के साथ व्यापार हो सकता है प्रभावित

इसके अलावा भारत का पश्चिम एशिया के साथ व्यापार भी प्रभावित हो सकता है। GCC देश भारत के कुल निर्यात का 13 प्रतिशत से अधिक और आयात का 16 प्रतिशत से अधिक हिस्सा रखते हैं। वहीं अन्य पश्चिम एशियाई देशों का निर्यात में करीब 2 प्रतिशत और आयात में लगभग 4 प्रतिशत हिस्सा है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारतीय बैंकों और निजी कंपनियों का भी इस क्षेत्र में निवेश और कारोबार है, जिससे तनाव बढ़ने की स्थिति में वित्तीय जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने ऊर्जा आपूर्ति के जोखिम को कम करने के लिए कई कदम उठाए हैं। देश अब 40 से अधिक देशों से कच्चा तेल आयात कर रहा है और 2022 के बाद रूस से आयात में भी बढ़ोतरी हुई है। साथ ही भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप और ओपन मार्केट ऑपरेशंस जैसे कदमों से रुपये में उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने और वित्तीय बाजारों को स्थिर बनाए रखने में मदद मिली है।
 

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